बस्तर में बदलाव की नई बयार
रायपुर : बस्तर का वह सुदूर वनांचल, जहाँ कभी सन्नाटा और दहशत का पहरा हुआ करता था, आज खुशहाली की एक नई इबारत लिख रहा है। बस्तर जिले के दरभा विकासखंड का कोलेंग क्षेत्र, जो दशकों तक माओवादी गतिविधियों के कारण विकास की दौड़ में पिछड़ गया था, अब अपनी एक नई और सकारात्मक पहचान गढ़ रहा है। कभी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसता यह इलाका अब सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं से लैस होकर विकास की मुख्यधारा में मजबूती से कदम रख चुका है। जो ग्रामीण कभी बुनियादी सुविधाओं और शासकीय योजनाओं से पूरी तरह महरूम थे, वे अब सीधे शासन-प्रशासन के संपर्क में हैं और विकास में अपनी सक्रिय सहभागिता निभा रहे हैं। एक समय था जब बारिश के दिनों में कोलेंग और उसके आसपास के गाँव पूरी तरह टापू बन जाते थे और ग्रामीणों को आवागमन के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती थी, लेकिन आज यहाँ की स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।
जगदलपुर से लेकर कोलेंग, चांदामेटा, छिंदगुर, काचीरास, सरगीपाल और कान्दानार जैसे दुर्गम गांवों तक बारहमासी पक्की सड़कों का जाल बिछ जाने से न केवल आवाजाही सुगम हुई है, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी आपातकालीन सेवाएं भी अब ग्रामीणों की चौखट तक पहुँच चुकी हैं। कोलेंग के सरपंच लालूराम नाग इस बदलाव को ऐतिहासिक मानते हुए कहते हैं कि पहले यह क्षेत्र बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटा हुआ था, लेकिन मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में माओवाद की समस्या कम होने और शासन की सक्रियता से ग्रामीणों के जीवन स्तर में एक क्रांतिकारी सुधार आया है।
सड़क और संचार सुविधाओं के इस अभूतपूर्व विस्तार ने छिंदगुर जैसे गांवों को सीधे जिला मुख्यालय से जोड़ दिया है, जिसे सरपंच सुकमन नाग सरकार की अंतिम छोर तक विकास पहुंचाने की प्रतिबद्धता का परिणाम बताते हैं। कनेक्टिविटी बेहतर होने का सबसे बड़ा और सीधा लाभ ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति पर पड़ा है, क्योंकि अब वे अपनी वनोपज और कृषि उत्पादों को बिना किसी बाधा के सीधे मंडियों तक ले जा पा रहे हैं।
इससे न केवल उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित हुए हैं। कभी उपेक्षा का शिकार रहा यह वनांचल क्षेत्र आज अपनी पुरानी पहचान को पीछे छोड़ते हुए विकास की रौशनी से जगमगा रहा है और पूरे बस्तर में खुशहाली की एक नई उम्मीद जगा रहा है।

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