सामाजिक सौहार्द की अनोखी मिसाल देखने को मिली
दमोह। मध्यप्रदेश के दमोह जिले से मानवता और सामाजिक समरसता को चरितार्थ करती एक बेहद सुखद तस्वीर सामने आई है। जहाँ समाज में अक्सर अमीरी-गरीबी और जातिगत भेदभाव की खबरें सुर्खियां बनती हैं, वहीं हटा जनपद के रसीलपुर गांव के सरपंच ने एक निर्धन दलित परिवार की बिटिया का कन्यादान कर इंसानियत की नई मिसाल पेश की है। सरपंच कमल दुबे ने न केवल शादी का पूरा खर्च उठाया, बल्कि पिता की तरह जिम्मेदारी निभाते हुए बेटी को सम्मान के साथ विदा किया।
आर्थिक तंगी के बीच सरपंच बने मददगार
रसीलपुर निवासी पूरन बंसल पेशे से दिहाड़ी मजदूर हैं और कड़ी मेहनत के बाद भी परिवार की बुनियादी जरूरतें ही मुश्किल से पूरी कर पाते हैं। जब उनकी बड़ी बेटी अर्चना का विवाह छतरपुर के बड़ा मलहरा निवासी करन बंसल से तय हुआ, तो पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती शादी के खर्च की थी। पिता की चिंता को देखते हुए गांव के मुखिया कमल दुबे आगे आए और उन्होंने पूरे आयोजन की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। उनकी इस पहल ने समाज को संदेश दिया कि जनप्रतिनिधि का दायित्व सिर्फ विकास कार्य ही नहीं, बल्कि हर वर्ग के सुख-दुख में सहभागी बनना भी है।
पूरे गांव ने निभाया परिजनों जैसा साथ
6 मई की रात जब छतरपुर से बारात रसीलपुर पहुंची, तो नजारा देखने लायक था। गांव की गलियों में जब दूल्हा घोड़ी पर सवार होकर निकला, तो पूरे गांव के लोग बारातियों के स्वागत में उमड़ पड़े। गांव के लोगों ने जातिगत दीवारों को ढहाकर इस शादी को अपने घर का समारोह बना लिया। खाने-पीने से लेकर टेंट और बिटिया को दिए जाने वाले घरेलू उपहारों तक की व्यवस्था में ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया। हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस पुण्य कार्य का हिस्सा बना।
समरसता की भावना से विदा हुई बिटिया
इस वैवाहिक समारोह में जिला पंचायत सदस्य मनीष तंतवाय ने भी शामिल होकर सामाजिक एकता का संदेश दिया। सरपंच कमल दुबे का कहना है कि गांव के मुखिया होने के नाते हर वर्ग को साथ लेकर चलना उनका कर्तव्य है, जिसे उन्होंने निभाया है। रसीलपुर की यह शादी महज दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि अपनत्व और एकता की वह मिसाल है जो बताती है कि यदि समाज एकजुट हो जाए, तो किसी भी बेटी की खुशियों के बीच गरीबी कभी रोड़ा नहीं बन सकती। परिजनों और ग्रामीणों ने नम आँखों से नवदम्पति को आशीर्वाद देकर विदा किया।

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