सीडीएफ को वहां पद.........जो कि मुनीर को पाकिस्तान का हिटलर बनने के लिए लाया जा रहा
लाहौर । पाकिस्तान में प्रस्तावित कमांड ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) पद को लेकर आंशका जाहिर की जा रही है, इसका मकसद पाकिस्तानी सेना की तीनों शाखाओं (थल सेना, नौसेना और वायु सेना) में ऑपरेशनल कमान को केंद्रीकृत करना है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के नेतृत्व में 27वें संविधान संशोधन के माध्यम से कमांड ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) का पद लाया जा रहा है। यह पद वर्तमान जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी (सीजेसीएससी) के चेयरमैन की सलाहकार भूमिका को खत्म करके, उसे संयुक्त अभियानों और रणनीतिक योजना पर सीधा और असीमित अधिकार देगा। यह तीनों सेनाओं को एकीकृत करके फैसले लेने की प्रक्रिया को एक व्यक्ति के अधीन कर देगा। इसका अर्थ यह होगा कि सेना प्रमुख अपनी मर्जी से हर फैसले ले सकेगा और प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति से सलाह की भी जरूरत नहीं होगी।
हिटलर और आजीवन शासन की आशंका
पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस संशोधन को लेकर सबसे बड़ा विवाद यह है कि सीडीएफ का पद सिर्फ सेना प्रमुख के लिए आरक्षित होगा और यह पद आजीवन रहेगा। यदि यह आशंका सही साबित होती है,तब इसका मतलब है कि असीम मुनीर मरते दम तक पाकिस्तान का सैन्य और, अप्रत्यक्ष रूप से, राजनीतिक नियंत्रण अपने हाथों में रखने वाले है। जिससे उन्हें पाकिस्तान का हिटलर कहा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि मुनीर के पास असीमित अधिकार आने से पाकिस्तान का सैन्य ढांचा तहस-नहस हो जाएगा, क्योंकि नौसेना और वायुसेना प्रमुखों के पद का भी कोई खास महत्व नहीं रहेगा। इस संशोधन के बाद आर्मी चीफ के फैसलों को चुनौती नहीं दी जा सकेगी, जिससे सैन्य नेतृत्व के भीतर शक्ति-संतुलन टूटने का खतरा बढ़ेगा। रक्षा जानकार बिलाल खान का मानना है कि संशोधन में सीडीएफ के पास कोई स्थायी स्टाफ या मुख्यालय होगा या नहीं, यह साफ नहीं है। इससे यह पद किसी मजबूत संस्थान के बजाय पूरी तरह से एक व्यक्ति (असीम मुनीर) पर निर्भर हो जाएगा। भले ही शहबाज शरीफ की सरकार इस अमेरिका या नाटो देशों जैसे आधुनिक सैन्य ढांचे के लिए जरूरी बता रही है, आलोचक इस आर्मी चीफ के पास असीमित अधिकार देने की कवायद मान रहे हैं।बात दें कि सीडीएफ पद को पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के केंद्रीकरण के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ सेना प्रमुख असीम मुनीर को असीमित अधिकार मिलने की आशंका है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि यह पद आजीवन रहा, तब यह पाकिस्तान में लोकतंत्र और सैन्य संस्थागत संतुलन के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकता है।

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