प्लास्टिक पैकिंग बैन से बढ़ी टेंशन, पान मसाला कारोबारियों ने जताई आपत्ति
पैकेजिंग पर प्रतिबंध: पान मसाला उद्योग ने उठाई समान नीति की मांग, कहा- 'सिर्फ हम पर ही रोक क्यों?'
कानपुर: पान मसाला और तंबाकू उत्पादों के लिए प्लास्टिक सैशे और मेटलाइज्ड पैकेजिंग पर प्रस्तावित प्रतिबंध को लेकर उद्योग जगत में असंतोष बढ़ गया है। विभिन्न व्यापारिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि पर्यावरण संरक्षण के नियम केवल एक उद्योग पर नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रों पर समान रूप से लागू होने चाहिए।
क्या है विवाद की जड़?
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने पैकेजिंग विनियम 2018 में संशोधन का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पादों को केवल कागज या प्राकृतिक सामग्री से बनी पैकेजिंग में बेचने का सुझाव है। वहीं, पॉलीथीन, लैमिनेटेड और मेटलाइज्ड सैशे पर पूरी तरह रोक लगाने की तैयारी है।
उद्योग का पक्ष और आंकड़े
कारोबारियों का तर्क है कि प्रदूषण के लिए केवल पान मसाला उद्योग को जिम्मेदार ठहराना गलत है। उनके अनुसार:
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कुल खपत: देश में खाद्य और FMCG सेक्टर हर साल 7 से 10 लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक पैकेजिंग का उपयोग करता है।
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पान मसाला की हिस्सेदारी: इस कुल खपत में पान मसाला उद्योग का हिस्सा मात्र 35 से 40 हजार टन (लगभग 3-5 प्रतिशत) ही है।
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अन्य उत्पाद: चिप्स, नमकीन, बिस्किट, शैम्पू, कॉफी और डेयरी उत्पादों में भी उसी मेटलाइज्ड पैकेजिंग का उपयोग होता है, जिसे पान मसाला के लिए प्रतिबंधित किया जा रहा है।
व्यापारियों की राय
कन्नौज के व्यवसायी रमेश महेश्वरी का कहना है कि यदि लक्ष्य सिंगल यूज प्लास्टिक को कम करना है, तो नियम पूरे एफएमसीजी (FMCG) सेक्टर पर लागू हों। वहीं, नोएडा के लैमिनेटर कारोबारी आरके जैन ने बताया कि देश में फ्लेक्सिबल पैकेजिंग की विशाल क्षमता के मुकाबले पान मसाला सेक्टर की खपत बहुत कम है।
बाजार की हकीकत: एक नजर में
| उत्पाद | सालाना बिक्री/खपत |
| इंस्टेंट नूडल्स | 8.68 अरब पैकेट |
| दूध (मिल्क पाउच) | 12 करोड़ पैकेट (प्रतिदिन) |
| अन्य | करोड़ों की संख्या में नमकीन, स्नैक्स और शैम्पू सैशे |
विशेषज्ञों का तर्क: स्नैक्स और मसाला उद्योग इन मेटलाइज्ड पैकिंग पर निर्भर है क्योंकि ये नमी रोककर उत्पादों की शेल्फ लाइफ 6 से 9 महीने तक बढ़ाते हैं।
मांग: एक देश, एक नियम
उत्तर प्रदेश के कानपुर, नोएडा, गाजियाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में पैकेजिंग की बड़ी इकाइयां स्थित हैं। उद्योग प्रतिनिधियों का स्पष्ट कहना है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए उठाए गए कदम स्वागत योग्य हैं, लेकिन नीति में भेदभाव नहीं होना चाहिए। यदि पाबंदी लगानी है तो इसे सभी कम कीमत वाले सैशे उत्पादों (Low-cost sachets) पर एक साथ लागू किया जाए।

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