वेतन निर्धारण विवाद में कर्मचारियों को राहत, हाई कोर्ट ने वसूली पर लगाई रोक
जबलपुर:मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के हित में एक बेहद अहम और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर विभाग अपने स्तर पर वेतन तय करने (सैलरी फिक्सेशन) में कोई चूक करता है, तो उसकी वजह से किसी भी तीसरे वर्ग (तृतीय श्रेणी) के कर्मचारी की जेब पर आर्थिक बोझ नहीं डाला जा सकता। हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि प्रशासनिक गलतियों का खामियाजा उन छोटे कर्मचारियों को नहीं भुगतना चाहिए जो इसके लिए बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं हैं।
न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने इस मामले पर राज्य सरकार की तरफ से दायर की गई पुनर्विचार याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब वेतन निर्धारण की प्रक्रिया में गलती पूरी तरह से प्रशासनिक अधिकारियों की तरफ से हुई है, तो उसकी भरपाई भी उन्हीं जिम्मेदार अफसरों से की जानी चाहिए। सरकार को अपने पैसों की वसूली उस अमले से करनी चाहिए जिसने यह त्रुटि की, न कि उस सीधे-साधे कर्मचारी से जिसे इसका लाभ मिला।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब राज्य सरकार ने एक उपनिरीक्षक (सब-इंस्पेक्टर) मनोज कुमार सिंह को मिले वेतन के कुछ हिस्से को वापस लेने (रिकवरी) की तैयारी की थी। सरकार का तर्क था कि साल 2007 के एक सरकारी आदेश के तहत सब-इंस्पेक्टरों के बदले हुए वेतनमान का लाभ सितंबर 2007 से दिया जाना तय हुआ था। इसके विपरीत, संबंधित कर्मचारी को इसका आर्थिक फायदा काफी समय पहले यानी अप्रैल 2006 से ही मिलना शुरू हो गया था। इसी वजह से विभाग ने अप्रैल 2006 से लेकर अगस्त 2007 के बीच दी गई अतिरिक्त सैलरी को वापस वसूलने का प्रस्ताव रखा था, जिसे अब हाई कोर्ट ने पूरी तरह अनुचित मानते हुए खारिज कर दिया है।

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