ऊर्जा सुरक्षा को देखते हुए भारत ने खाड़ी में युद्धपोतों की संख्या बढ़ाई
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य संकट और युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर पहुंच गया है। इस संवेदनशील समुद्री मार्ग पर बढ़ते खतरों को देखते हुए भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। भारतीय नौसेना ने खाड़ी क्षेत्र में अपने युद्धपोतों की संख्या बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि कच्चे तेल और गैस लेकर आने वाले भारतीय जहाजों को सुरक्षित मार्ग प्रदान किया जा सके।रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस जलमार्ग के एक तरफ फारस की खाड़ी और दूसरी ओर ओमान की खाड़ी स्थित है। भारत अपनी तेल और गैस की जरूरतों के लिए कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों पर निर्भर है, जिनके टैंकर इसी मार्ग से होकर गुजरते हैं। वर्तमान में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण इस मार्ग पर आवाजाही लगभग ठप हो गई है, जिससे भारत के करीब 22 व्यापारिक जहाज वहां फंसे हुए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नौसेना ने वहां मौजूद तीन युद्धपोतों के साथ अतिरिक्त जहाजों को तैनात करने का निर्णय लिया है, जिससे कुल संख्या छह से सात तक हो जाएगी। भारतीय नौसेना यह मिशन ऑपरेशन संकल्प के तहत चला रही है। इस अभियान की शुरुआत वर्ष 2019 में समुद्री सुरक्षा और भारतीय व्यापारिक जहाजों में भरोसा बनाए रखने के उद्देश्य से की गई थी। नौसेना की इस मुस्तैदी का सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिला है। हाल ही में शिवालिक और नंदा देवी नामक दो एलपीजी जहाजों को करीब 92,712 मीट्रिक टन गैस के साथ सुरक्षित भारतीय तटों तक पहुँचाया गया है। इसके अलावा, एक भारतीय युद्धपोत ने हाल ही में यूएई के फुजैरा पोर्ट से निकले तेल टैंकर को एस्कॉर्ट कर सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराया। उल्लेखनीय है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से वैश्विक कच्चे तेल की लगभग 20 प्रतिशत आपूर्ति होती है। ऐसे में भारत की यह सैन्य तैनाती न केवल राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अनिवार्य है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों में स्थिरता बनाए रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। नौसेना अदन की खाड़ी में भी 2008 से लगातार एंटी-पायरेसी मिशन चला रही है, जो समुद्र में भारत की बढ़ती शक्ति और जिम्मेदारी को दर्शाता है।

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